आयुर्वेद के अनुसार जानिए आपकी प्रकृति कैसी है ( According to Ayurveda, know how your nature is )

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Prakruti – The Ayurvedic Body Types and their Importance

नमस्कार मैं  आरोही सोनी और हिंदी अयुर में आपका स्वागत है। काफी लोगों ने कमेंट करके हमें बताया था कि आप प्रकृति के ऊपर वीडियो बनाइए। सच पूछिए 

तो खुद की प्रकृति के बारे में जानना, यानि खुद की प्रकृति कौन सी है वात प्रकृति है। पित्त प्रकृति या फिर कफ प्रकृति है ये जानने की उत्सुकता हर किसी के मन में रहती है।

और आयुर्वेद ने भी प्रकृति का बहुत महत्व बताया है। इसीलिए आज का जो ब्लॉग है ये प्रकृति के ऊपर है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि 

  • प्रकृति क्या है। 
  • प्रकृति कैसे बनती है 
  • इसके प्रकार कौन से है  
  • इसे जानना हमारे लिए जरूरी क्यों है। 

इन सबके बारे में आज के ब्लॉग में जानेंगे । 

सबसे पहले देखते है कि 

प्रकृति क्या है l ( What is nature ) –

प्रकृति का अर्थ होता है नेचर l हमारा सहज भाव यानि हमारा स्वभाव। आयुर्वेद ने बताया है हर व्यक्ति एक दूसरे से अलग है। हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, शारीरिक क्रिया क्षमता, सोचने समझने की शक्ति,

हर एक की बुद्धिमत्ता, परिस्थिति का सामना करने की शक्ति, खानपान की रुचियां हर एक चीज एक दूसरे से अलग है। आप भी देखते होंगे कि आपके परिवार में या जहां पर आप काम करते हैं 

या फिर आपके आस पड़ोस के जो लोग हैं वो हर एक एक दूसरे से अलग हैं। किसी को गुस्सा बहुत ज्यादा आता है या कोई हर परिस्थिति में शांत रहता है किसी को बोलना बहुत  अच्छा लगता है 

तो कोई दूसरा शांत रहता है किसी किसी को काम करने की बहुत जल्दी है तो किसी को आलस है । तो ये जो सब स्वभाव है ये हमारे प्रकृति के ऊपर ये डिपेंड रहते हैं। तो आज जानेंगे कि प्रकृति का हमारी कौन कौन सी चीजों पर असर होता है। 

प्रकृति कैसे बनती है। (How to make nature ) –

प्रकृति हमें जन्म से, बल्कि गर्भावस्था से ही मिलती है और ये मृत्युपर्यंत हमारे साथ रहती है। क्या हम प्रकृति को बदल सकते हैं। जी नहीं हम इसे कभी नहीं बदल सकते। 

पर अगर हम इसे बदल भी नहीं सकते तो फिर इसके बारे में जानना जरूरी क्यों है। सच पूछिए तो प्रकृति का पूरा ध्यान सिर्फ आयुर्वेद चिकित्सक के लिए जरूरी है। 

लेकिन अगर आप इसमें से कुछ बातों के बारे में जानेंगे तो इसमें आपका भी फायदा है। तो चलिए जानते हैं कि प्रकृति का ध्यान जरूरी क्यों है। 

अगर हमें खुद की प्रकृति के बारे में पता हो तो खानपान से संबंधित कुछ सावधानियां हम बरत सकते हैं। अपने खाने में हमें कौन सी चीज खाने चाहिए कौन सी चीज नहीं खाने चाहिए। 

हमारी प्रकृति के अनुसार कौन सा आहार लेने से हमें फायदा हो सकता है और किससे हमें नुकसान हो सकता है। कौन सी सब्जियां, कौन से फल हमारे लिए हितकर है 

ये सब हम प्रकृति के अनुसार इसके बारे में सोच सकते हैं। जैसे अगर किसी की पित्त प्रकृति है तो सोम जो है वो पित्त शामक है और जो काली मिर्च व पित्त को बढ़ाने वाली है 

तो इसके बारे में सावधानियां बरत सकते हैं। इसके साथ साथ ये शारीरिक क्रियाएं हमारे कैसे हो, हमने व्यायाम कितना करना चाहिए, ये भी प्रकृति के ऊपर है। एक ही व्यायाम प्रकृति हमें फायदा दिलाएगा 

ऐसा बिल्कुल नहीं है। तो जो हमारा खानपान है जो एक शारीरिक क्रिया है वो प्रकृति के अनुसार हम करेंगे तो उसका फायदा हमें मिलेगा। 

हर मौसम में भी आपको आपकी प्रकृति के अनुसार सावधानी बरतनी होगी। जैसे जो शरद ऋतु यानि अक्टूबर महीना है इसमें पित्त का प्रकोप रहता है 

तो जिस व्यक्ति की पित्त प्रकृति है उसने इस ऋतु में पित्त शमन करने वाला जो खानपान है उसका सेवन करना चाहिए लेकिन ये तभी संभव है जब उसको पता है कि उसके पित्त प्रकृति है l 

उसके साथ साथ ही जो आयुर्वेद चिकित्सक हैं वो चिकित्सा देते समय आपकी प्रकृति के अनुसार आपको औषधियां बताते हैं। किसी को भी किसी खास बीमारी के लिए कोई एक ही दवाई या फिर एक ही नुस्खा काम नहीं कर सकता 

तो अलग अलग प्रकृति में अलग अलग औषधियों का सेवन करना जरूरी रहता है। इसके साथ ही प्रकृति का ज्ञान इसलिए भी जरूरी है ताकि हम दूसरों का व्यवहार समझ सके। काफी बार हम सोचते हैं कि सामने वाला इतना गुस्सा क्यों करता है 

या फिर इसको इतनी जल्दी क्यों है या इतना स्लो क्यों है तो उसका मूल स्वभाव है हम उसे नहीं बदल सकते तो प्रकृति का ज्ञान हम इन सब बातों के लिए हमें बहुत जरूरी है 

ताकि हमें इन सब बातों का पता चले। इसके साथ ही एक और बात भी जरूरी है कि प्रकृति को जानने के लिए हमें वात पित्त कफ ये तीन दोष है इनके बारे में जानना भी बहुत जरूरी है। 

इसके बारे में हमने हमारा पिछला ब्लॉग में वात पित्त कफ को इन दोषों के ऊपर है।

तो गर्भाधान के समय वीर्य और रज यानि पुरूष बीज और स्त्री बीज इनका जो संयोग होता है तो ये जो पुरुष और स्त्री बीज है इसमें जो बात पित्त कफ दोष है 

इसमें से कौनसा दोष अधिक है यानि  कौनसा दोष है dominant है उसके अनुसार जो बच्चा  है उसकी प्रकृति है उसका नेचर बनेगा। इसके साथ ही और भी कुछ बाते हैं 

जिसका प्रकृति पर असर पड़ता है वो है गर्भाधान के समय जो मां बाप है उनके मन की स्थिति कैसी है। गर्भाधान का काल य्यानी मौसम कौन सा है, फिर गर्भाशय की स्थिति कैसी है। 

गर्भाशय की सितिथि कैसी है यानि जिस गर्भ में भ्रूण पलेगा, तो वो गर्भाशय निरोगी है या उसमें कोई विकार है ये भी उस पर असर करता है। उसके साथ ही गर्भिणी है उसके मन की स्थिति कैसी है। जो गर्भिणी है 

उसका खानपान कैसा है l  उसकी जो शारीरिक क्रिया है वो कैसी है इसका भी उस पर असर रहेगा। इसके साथ ही जो पंच महाभूत जो आकाश वायु तेज आप और पृथ्वी l 

ये जो पांच महाभूत है, उसमे से किसका प्राबलय ज्यादा है l उसके अनुसार भी जो बच्चा है उसकी प्रकृति का निर्माण होगा। अब देखते हैं कि 

प्रकृति के प्रकार कौन से हैं ( Which is the type of nature ) –

तो इसमें दोषस प्रकृति, मानस  प्रकृति और भूत प्रकृति ये तीन प्रकार है। इसमें फिर दोषस प्रकृति के प्रकार  वात प्रकृति, पित्त प्रकृति, कफ प्रकृति l 

वात पित्त प्रकृति वात कफ प्रकृति और कफ पित्त प्रकृति इस प्रकार है और सबसे आखिर में त्रिदोष प्रकृति। इसके साथ ही जो मानस प्रकृति है उसमें सात्विक राजसिक और तामसिक प्रकृति है 

जो भूत प्रकृति है उसके भी पांच प्रकार हैं देखिये दोष प्रकृति में ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अगर किसी की वात प्रकृति है तो उसमें पित्त और कफ दोष बिल्कुल भी नहीं है। 

हर व्यक्ति के शरीर में वात पित्त कफ ये तीनों दोष रहते हैं सिर्फ उसमें कौन से दोषों की अधिकता है उसके अनुसार वो प्रकृति जो है वो बनती है। 

अगले ब्लॉग में हम बात प्रकृति पित्त प्रकृति और प्रकृति इसके बारे में अलग अलग में हम विस्तार से जानेंगे तो हमारे साथ बने रहिए तो फिर मिलते हैं अगली ब्लॉग में आयुर्वेद को अपनाएं स्वस्थ रहें। 

नमस्कार।

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